कभी देखी हैं तुमने आलू की आँखें
गहरी काली कुरूप सी
जन्म देती हैं एक नया पौधा
मौका पाते ही, सिंचित होते ही
उत्पत्ति होती है एक नयी सृष्टि की
बिना किसी सराहना की आकांक्षा लिए
बिना अपनी कुरूपता पर चिंतित हुए
फिर क्यों हम मनुष्य सोचते हैं
कृष्ण चेहरे पर नाक भौं सिकोड़ते हैं
सक्षम वो उतना ही जितने हैं बाकी
भले ही अधिक न हों पर कम नहीं थोड़ा भी
फिर रूप पर अपने गर्व इतना क्यों
समाप्त होगा यह भी, होते हैं स्वप्न ज्यों।