बतहवा - मालिक का मँझला बेटा।नाम तो प्रकाश था, पर वो यही बुलाती थी। बतहिया का बतहवा। बचपन से माँ के पास कम, उसके पास ज़्यादा पला था।
शाम को जब मालिक के घर गयी थी तो घर पर नहीं था। कहीं ट्यूसन पढ़ाने गया हुआ था। भाइयों में एक वही कमाने वाला था। डिग्री मिलने के बाद नौकरी नहीं लगी थी पर ३ भाइयों, एक बहन और बीमार माँ-बाप वाला घर चलना तो था ही। यूँ तो खेत भी थे मालिक के पास लेकिन खेती करने को पूँजी नहीं बची थी।एक समय था जब इस घर के सामने से अंग्रेज़ भी टोपी उतारकर गुज़रा करते थे पर अब वो बात नहीं रही।
मालकिन की बीमारी की वजह से सब चला गया धीरे धीरे।और जो बचा वो कोर्ट के चक्करों में जाता रहा। सीधे को सब सताते हैं। मालिक बहुत सीधे हैं, एकदम सज्जन आदमी।लोगों ने बहुत फ़ायदा उठाया इसका।एक समय की मिल्कियत अब बस कुछ टूटी कोठरियों में सिमट कर रह गयी है। पर है तो मालिक का ही घर।
घर पहुँची तो पुजिया ने ताना मारा-
"आ गयी?भोर हो गया, नहीं?" और हंस कर निकल गयी।
वो ऐसे ही बात करती है।सब मुँह पे बोलती है। अपने में मगन रहती है पर दिल में कुछ रखती नहीं।
और कोई घर में नहीं दिखा। छोटे दोनो लड़के बाहर दालान में लालटेन की रोशनी में पढ़ने बैठ गए थे।पुजिया किसी पड़ोसी के यहाँ जाकर भाभियों के साथ चुहल कर रही होगी।
बतहिया मुस्कुरा कर रसोईघर में घुस गयी।देखा तो बर्तन वैसे ही पड़े थे दिन के। वो उठाकर माँजने बैठ गयी।
आज कई दिनों के बाद वो मालिक के घर आयी थी। थोड़े पैसों की ज़रूरत आन पड़ी थी। आज तक मालिक के घर के अलावा किसी से कुछ माँगा नहीं उसने।मालिक के घर मिलेगा तो ठीक, नहीं तो मन मार लेगी।किसी दूसरे के यहाँ माँग कर मालिक को शर्मिंदा नहीं कर सकती थी वो।
सब काम ख़त्म हो गए। मालकिन सोयी हुयी थी, मालिक बरामदे में बैठे कुछ सोच रहे थे। बतहिया उनके पास पहुँची।
"भैया, कुछ काम था।"
मालिक ने चौंक कर देखा। "हाँ, बोलो"
वो बोल नहीं पा रही थी। घर की स्थिति उससे छुपी तो नहीं थी। कैसे माँगे?
"क्या बात है?" मालिक ने फिर पूछा।
हिम्मत जुटायी उसने "वो भैया, परसों बेटी की विदायी है। साथ में कुछ संदेश भेजना पडेग़ा।इसलिए आयी थी।कुछ पैसे होते तो......." बात आधी ही छोड़ दी उसने।
मालिक का मुँह गम्भीर हो गया "तुम्हारा बतहवा आया नहीं है अभी तक।"
वो समझ गयी।घर में पैसे नहीं हैं।
"तेल गरम कर दूँ मालिश के लिए?" उसने मालिक से पूछा। मालिक का गम्भीर मुँह देखा नहीं जा रहा था।
"नहीं, रहने दो।मैं थोड़ा टहल लेता हूँ।" कहकर मालिक उठ गए।इतनी पुरानी नौकरानी को माँगा हुआ ना दे पाने का दर्द वो उसे देखने नहीं देना चाहते थे।
वो फिर चुपचाप बरामदे पर जाकर बैठ गयी। थोड़ी देर बैठी रही।तभी देखा बुधना को हिलते डुलते आँगन में घुसते।सीधा उसके पास आया।
"दीदिया बुला रही है।" बुधना यही संदेश देने आया था।
उसने इधर उधर देखा, कोई नहीं था। गहरी साँस भरकर उठ गयी।
"चल।" उसने बुधना से कहा।बुधना भाग लिया। वो धीमे धीमे चल दी। आँगन से बाहर निकलकर सड़क पर नज़र दौड़ाई।बाज़ार से आने वाली सड़क पर कुछ नज़र नहीं आया।उसने सुनने की कोशिश की। कहीं से कोई साइकिल की आवाज़ सुनाई पड़ जाए। बतहवा के आने की उम्मीद कर रही थी। कोई आवाज़ ना पाकर फिर घर की तरफ़ मुड़ गयी।
"क्या हुआ? क्यूँ बुलावा भेजा?" घर पहुँचते ही बेटी से पूछा।
"परसों चली जाऊँगी।थोड़ा समय मेरे साथ भी तो गुज़र लो।" उसने मुँह बनाकर कहा।
"अरे तेरे जाने का ही इंतज़ाम करने गयी थी।" बोलकर बेटी के पास बैठ गयी।
बेटी की बातें शुरू हो गयी। कल जमाई जी आने वाले हैं। क्या क्या करना है, क्या क्या ले जा रही और भी बहुत कुछ। वो चुपचाप सुनती रही, मुस्कुराती रही। मन की उलझन खिलती बेटी के सामने नहीं रखना चाहती थी। कल सुबह अंधेरे उठकर फिर से जाएगी मालिक के पास। बतहवा खेत के लिए निकल जाए उसके पहले।
यही सब सोच रही थी कि बाहर से आवाज़ आयी।कोई उसे ही पुकार रहा था। आवाज़ सुनकर मन में उम्मीद जागी।बतहवा पुकार रहा था। पैर में पहिए लग गए।जल्दी से बाहर निकली।
"बाबा बता रहे थे तुम घर पे आयी थी।" बतहवा ने देखते ही बोला।
"बैठो तो पहले।" उसने मोढ़ी आगे कर दी थी।
"क्या हुआ, कुछ काम था?बाबा ने आगे कुछ बताया नहीं।" बतहवा ने बैठते-बैठते पूछा।
मालिक संकोच में थे अभी तक।
वो ख़ुद संकोच में थी। "वो बेटी की विदायी है परसों, कल जमाई आ रहे हैं। हाथ थोड़ा तंग था।"
"अरे तो पहले बताती ना।मैं बाज़ार से लेता आता।"
"नहीं वो बाज़ार वाला तो सब हो गया।बेटी-जमाई के हाथ में कुछ नगद भी तो देना रहेगा।" बोलते बोलते वो दूसरी ओर देखने लगी। उसे पता है बतहवा दिन-रात मेहनत करता है घर चलाने में, लेकिन ट्यूसन में हो ही कितना पाता होगा।
"कितने में हो जाएगा?" बतहवा ने पूछा।उसकी आवाज़ में लगाव था।
"५० तक में हो जाता।" उसने धीरे से कहा।
बतहवा ने जेब में हाथ डाला।कुछ नोट निकाले। गिनकर ५० उसकी तरफ़ बढ़ा दिए।
उसने बतहवा का मुँह देखा।
"५० हैं, रख लो। और चाहिए तो बता देना।" उसने देते हुए कहा।
"नहीं, बहुत हैं।" उसने काँपते हाथों से पैसे ले लिए।
बतहवा उठ खड़ा हुआ।
"चाय पियोगे?" उसने पूछा।
"नहीं, बाबा की मालिश करके खाना खाऊँगा।"
तब तक बेटी दरवाज़े पर आ गयी थी।
"ससुराल जाकर गाँव का मज़ाक़ मत उड़वाना ।" बतहवा ने बेटी से चुहल की।
बेटी मुस्कुराकर फिर अंदर भाग गयी।
बतहवा बाहर निकल गया। अब जेब में ज़्यादा नहीं बचे थे। कोई बात नहीं।एक सप्ताह बाहर चाय नहीं पिएगा और शाम का नाश्ता नहीं भी किया कुछ दिन तो क्या होता है। दोनो समय खाना तो अच्छे से खाता ही है।अंधेरे में दालान में बैठे भाइयों की लालटेन की तरफ़ पैर बढ़ गए उसके।
शाम को जब मालिक के घर गयी थी तो घर पर नहीं था। कहीं ट्यूसन पढ़ाने गया हुआ था। भाइयों में एक वही कमाने वाला था। डिग्री मिलने के बाद नौकरी नहीं लगी थी पर ३ भाइयों, एक बहन और बीमार माँ-बाप वाला घर चलना तो था ही। यूँ तो खेत भी थे मालिक के पास लेकिन खेती करने को पूँजी नहीं बची थी।एक समय था जब इस घर के सामने से अंग्रेज़ भी टोपी उतारकर गुज़रा करते थे पर अब वो बात नहीं रही।मालकिन की बीमारी की वजह से सब चला गया धीरे धीरे।और जो बचा वो कोर्ट के चक्करों में जाता रहा। सीधे को सब सताते हैं। मालिक बहुत सीधे हैं, एकदम सज्जन आदमी।लोगों ने बहुत फ़ायदा उठाया इसका।एक समय की मिल्कियत अब बस कुछ टूटी कोठरियों में सिमट कर रह गयी है। पर है तो मालिक का ही घर।
घर पहुँची तो पुजिया ने ताना मारा-
"आ गयी?भोर हो गया, नहीं?" और हंस कर निकल गयी।
वो ऐसे ही बात करती है।सब मुँह पे बोलती है। अपने में मगन रहती है पर दिल में कुछ रखती नहीं।
और कोई घर में नहीं दिखा। छोटे दोनो लड़के बाहर दालान में लालटेन की रोशनी में पढ़ने बैठ गए थे।पुजिया किसी पड़ोसी के यहाँ जाकर भाभियों के साथ चुहल कर रही होगी।
बतहिया मुस्कुरा कर रसोईघर में घुस गयी।देखा तो बर्तन वैसे ही पड़े थे दिन के। वो उठाकर माँजने बैठ गयी।
आज कई दिनों के बाद वो मालिक के घर आयी थी। थोड़े पैसों की ज़रूरत आन पड़ी थी। आज तक मालिक के घर के अलावा किसी से कुछ माँगा नहीं उसने।मालिक के घर मिलेगा तो ठीक, नहीं तो मन मार लेगी।किसी दूसरे के यहाँ माँग कर मालिक को शर्मिंदा नहीं कर सकती थी वो।
सब काम ख़त्म हो गए। मालकिन सोयी हुयी थी, मालिक बरामदे में बैठे कुछ सोच रहे थे। बतहिया उनके पास पहुँची।
"भैया, कुछ काम था।"
मालिक ने चौंक कर देखा। "हाँ, बोलो"
वो बोल नहीं पा रही थी। घर की स्थिति उससे छुपी तो नहीं थी। कैसे माँगे?
"क्या बात है?" मालिक ने फिर पूछा।
हिम्मत जुटायी उसने "वो भैया, परसों बेटी की विदायी है। साथ में कुछ संदेश भेजना पडेग़ा।इसलिए आयी थी।कुछ पैसे होते तो......." बात आधी ही छोड़ दी उसने।
मालिक का मुँह गम्भीर हो गया "तुम्हारा बतहवा आया नहीं है अभी तक।"
वो समझ गयी।घर में पैसे नहीं हैं।
"तेल गरम कर दूँ मालिश के लिए?" उसने मालिक से पूछा। मालिक का गम्भीर मुँह देखा नहीं जा रहा था।
"नहीं, रहने दो।मैं थोड़ा टहल लेता हूँ।" कहकर मालिक उठ गए।इतनी पुरानी नौकरानी को माँगा हुआ ना दे पाने का दर्द वो उसे देखने नहीं देना चाहते थे।
वो फिर चुपचाप बरामदे पर जाकर बैठ गयी। थोड़ी देर बैठी रही।तभी देखा बुधना को हिलते डुलते आँगन में घुसते।सीधा उसके पास आया।
"दीदिया बुला रही है।" बुधना यही संदेश देने आया था।
उसने इधर उधर देखा, कोई नहीं था। गहरी साँस भरकर उठ गयी।
"चल।" उसने बुधना से कहा।बुधना भाग लिया। वो धीमे धीमे चल दी। आँगन से बाहर निकलकर सड़क पर नज़र दौड़ाई।बाज़ार से आने वाली सड़क पर कुछ नज़र नहीं आया।उसने सुनने की कोशिश की। कहीं से कोई साइकिल की आवाज़ सुनाई पड़ जाए। बतहवा के आने की उम्मीद कर रही थी। कोई आवाज़ ना पाकर फिर घर की तरफ़ मुड़ गयी।
"क्या हुआ? क्यूँ बुलावा भेजा?" घर पहुँचते ही बेटी से पूछा।
"परसों चली जाऊँगी।थोड़ा समय मेरे साथ भी तो गुज़र लो।" उसने मुँह बनाकर कहा।
"अरे तेरे जाने का ही इंतज़ाम करने गयी थी।" बोलकर बेटी के पास बैठ गयी।
बेटी की बातें शुरू हो गयी। कल जमाई जी आने वाले हैं। क्या क्या करना है, क्या क्या ले जा रही और भी बहुत कुछ। वो चुपचाप सुनती रही, मुस्कुराती रही। मन की उलझन खिलती बेटी के सामने नहीं रखना चाहती थी। कल सुबह अंधेरे उठकर फिर से जाएगी मालिक के पास। बतहवा खेत के लिए निकल जाए उसके पहले।
यही सब सोच रही थी कि बाहर से आवाज़ आयी।कोई उसे ही पुकार रहा था। आवाज़ सुनकर मन में उम्मीद जागी।बतहवा पुकार रहा था। पैर में पहिए लग गए।जल्दी से बाहर निकली।
"बाबा बता रहे थे तुम घर पे आयी थी।" बतहवा ने देखते ही बोला।
"बैठो तो पहले।" उसने मोढ़ी आगे कर दी थी।
"क्या हुआ, कुछ काम था?बाबा ने आगे कुछ बताया नहीं।" बतहवा ने बैठते-बैठते पूछा।
मालिक संकोच में थे अभी तक।
वो ख़ुद संकोच में थी। "वो बेटी की विदायी है परसों, कल जमाई आ रहे हैं। हाथ थोड़ा तंग था।"
"अरे तो पहले बताती ना।मैं बाज़ार से लेता आता।"
"नहीं वो बाज़ार वाला तो सब हो गया।बेटी-जमाई के हाथ में कुछ नगद भी तो देना रहेगा।" बोलते बोलते वो दूसरी ओर देखने लगी। उसे पता है बतहवा दिन-रात मेहनत करता है घर चलाने में, लेकिन ट्यूसन में हो ही कितना पाता होगा।
"कितने में हो जाएगा?" बतहवा ने पूछा।उसकी आवाज़ में लगाव था।
"५० तक में हो जाता।" उसने धीरे से कहा।
बतहवा ने जेब में हाथ डाला।कुछ नोट निकाले। गिनकर ५० उसकी तरफ़ बढ़ा दिए।
उसने बतहवा का मुँह देखा।
"५० हैं, रख लो। और चाहिए तो बता देना।" उसने देते हुए कहा।
"नहीं, बहुत हैं।" उसने काँपते हाथों से पैसे ले लिए।
बतहवा उठ खड़ा हुआ।
"चाय पियोगे?" उसने पूछा।
"नहीं, बाबा की मालिश करके खाना खाऊँगा।"
तब तक बेटी दरवाज़े पर आ गयी थी।
"ससुराल जाकर गाँव का मज़ाक़ मत उड़वाना ।" बतहवा ने बेटी से चुहल की।
बेटी मुस्कुराकर फिर अंदर भाग गयी।
बतहवा बाहर निकल गया। अब जेब में ज़्यादा नहीं बचे थे। कोई बात नहीं।एक सप्ताह बाहर चाय नहीं पिएगा और शाम का नाश्ता नहीं भी किया कुछ दिन तो क्या होता है। दोनो समय खाना तो अच्छे से खाता ही है।अंधेरे में दालान में बैठे भाइयों की लालटेन की तरफ़ पैर बढ़ गए उसके।