Monday, April 17, 2017

आह्वान

भाषण अब पर्याप्त नहीं
सैनिक गँवा रहे हैं प्राण
राष्ट्र सेवा के वचन का
हे प्रधान अब दो प्रमाण

पुनः कोई न ऊरी हो
न कारगिल का घमासान
न फिर कुलभूषण बंदी हो
न हनुमंथप्पा हो बलिदान

आदित्य कहे अब प्रण कर लो
चाहे जग का बदले विधान
थप्पड़ के बदले शीष धरो
वार करो अब वज्र समान

कुरूक्षेत्र चुन लो तुम आज
और करो युद्ध का आह्वान,
कर दो समाप्त वो रुग्ण राष्ट्र
या रोग का कर दो निदान

युद्ध अगर हो युद्ध सही
पर बचा रहे अपना सम्मान
राष्ट्र सेवा के वचन का
हे प्रधान अब दो प्रमाण।

उत्पत्ति

समुद्र भी क्षुब्ध था, ये गगन भी सुप्त था,   थी धरा भी शांत सी, और वायु भी तो मौन था. न तृण कोई था हिल रहा, न पत्तियों में सरसरी , जीव सारे थ...