मैं विचित्र सोच रखता हूँ, ऐसा मेरे मित्र कहते हैं। और मनुष्य वैसा ही होता है जैसी उसकी सोच, तो फिर मैं विचित्र हूँ। हालाँकि मुझे सामान्यत: ऐसा प्रतीत नहीं होता, परंतु इतने सारे लोग तो एक साथ गलत नहीं बोलेंगे। अतएव मानने का प्रयत्न करता हूँ एक बार। सोचा, देखूँ तर्क से निष्कर्ष क्या निकलता है? पर मैं जब देखता हूँ तो मुझे तो संसार विचित्र प्रतीत होता है। आडम्बर में लीन, मनुष्य अपने ही ज्ञान का अपने ही विरुद्ध दुरुपयोग करता हुआ। मुझे ऐसा लगता है, औरों को नहीं। आडम्बर का एक उदाहरण दूँ? पर पहले उस पर विश्वास करने को तैयार हों तो। कम से कम न्यूनतम स्तर पर विचार करेंगे, इसकी अपेक्षा तो कर ही सकता हूँ। यदि इतना भी आश्वासन नहीं दे सकते तो क्षमा करें, आप मेरे विचारों के लक्षित पाठक नहीं हैं।
मुंबई मैराथन का नाम आप सब ने सुना होगा। जो वास्तविक मैराथन है, उसकी कथा आपमें से कितनों के स्मरण में होगी ये पुन: चर्चा का विषय हो सकती है। मैं वो चर्चा यहाँ आरंभ नहीं करना चाहता। औचित्य नहीं दिखता मुझे उसका, अतएव स्वयं ही थोडा विषय से भटक कर वो कथा यहाँ दुहरा देता हूँ, अपितु कथा का सार दुहरा देता हूँ। एक धावक के शौर्य की गाथा, जिसने अपने राष्ट्र की रक्षा में अपने प्राण त्याग दिये। मैराथन दौड का आयोजन प्रतिवर्ष उसी महान दौड की स्मृति में आरंभ किया गया। आप सोच रहे होंगे ये मैं कहाँ से कहाँ आ गया? अब भूमिका के बिना कैसी विवेचना। तो पुन: मुंबई मैराथन पर आता हूँ। मुझे इसमें वास्तविक मैराथन के सार का दर्शन नहीं होता। एक आडंबर से पूर्ण, मनोरंजन से भरी, विभिन्न सिने तारक- तारिकाओं से सुसज्जित एक चलचित्र सी प्रस्तुति। इसके आरंभ के कई दिनों पहले ही आरंभ हो जाती है इस नाटक को बेचने की तैयारी। मैंने नही देखा किसी भी समाचार चैनल को किसी वास्तविक धावक की जीवनी पर कभी कोई कार्यक्रम प्रस्तुत करते। दिनों तक कौन से नायक, कौन सी नायिकायें इस आडंबर का हिस्सा होंगी, इसी की प्रस्तुति चलती रहती है। मैराथन की समाप्ति पर ही कुछ मिनट उस वास्तविक धावक पर व्यय किये जाते हैं। मुझे ये निंदनीय प्रतीत होता है। और इसके कारण हम ही हैं। क्योंकि हम ही हैं जो नाटकीयता से भरे समाचार चैनलों को वर्ष प्रतिवर्ष उत्तम दर्जा देते हैं। पर हम ऐसा होने देते हैं, क्योंकि नाटकीयता और मनोरंजन ही लक्ष्य बना रखा है हमने जीवन का। वास्तविकता चुभती है, अतएव शुतुरमुर्ग बनकर आँखें मूँद लेते हैं। मूल्यों का मूल्य नहीं रखा हमने, और एक अंध दौड़ के प्रतिभागी हो गए। इसलिए कि मूल्यों को ढोना पड़ता है, उसमे आनंद की अनुभूति नहीं होती। आनंद ही सर्वोपरि हो गया हमारे लिए और सब तजकर हम आनंदमार्गी हो गए। अंध दौड़ में दौड़ते गए कि अधिकाधिक आनंद जुटा सकें। एक महान परंपरा कि आत्मा का नाश कर दिया हमने कि आनंद की प्राप्ति हो सके, थोडा और आडम्बर हो सके। विचार कीजिये, शायद समझ ही जायें कि अंततोगत्वा कर क्या रहे हैं हम?
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ReplyDeletemarathon ka apna hi mahatva hai, sadiyo se chjali aa rahi , olympic ka ek mahtvapoorna hissa hai. par jub baat iski commercialiaty ki aati hai toh mumbai marathan ka chera ubharta hai. ab gaur matlab hai ki jo dikhta hai wohi bikta hai.. so dikhane aur bikane ka karobaar shuru hota hai. ab yeh aape nirbhar hota hai ki aap isko kis najariye se dekh rahe hai.. ghrina se kyoki aapko yeh adambar dikh raha hai ya prem se kyoki kuch bhi kar k paise jutaye jaa rahe hai jiska 1 hissa kisi foundation ko jayega.