तू क्यूँ रोती हे मात बता,
तेरी व्यथा यहाँ कौन सुने,
तू करती रहे चीत्कार मगर,
कर्ण दान तुझे कौन करे.
क्रोध-काम में लिप्त हैं सब,
है लोभ इतना यह तृप्त हैं कब,
आडम्बर में आकंठ डूबे,
आनंद ही इनका ध्येय है अब
तेरी छाती चाहे छलनी हो,
व्यभिचार इनका चलता रहे,
तू करती रहे रुदन-क्रंदन,
सुख इनको बस मिलता रहे.
क्यूँ कष्ट उठाएं तेरे पुत्र,
क्यूँ तेरे लिए तज दें आनंद,
एक अंध दौड़ इनका है लक्ष्य,
क्यूँ तुझ हेतु पराभव-आलिंगन,
कोई क्रांति नहीं है हल इसका,
प्रत्येक बुद्धि ही भ्रष्ट हो जब,
क्या करे आदित्य दिवस देकर
मनुज अर्धरात्रि पूजे जब.
Tuesday, April 6, 2010
Subscribe to:
Comments (Atom)
उत्पत्ति
समुद्र भी क्षुब्ध था, ये गगन भी सुप्त था, थी धरा भी शांत सी, और वायु भी तो मौन था. न तृण कोई था हिल रहा, न पत्तियों में सरसरी , जीव सारे थ...
-
चाह मेरी हर हो पूरी, भगवान नहीं मैं इस जग का. हर मार्ग पर मैं रहूँ सफल, भाग्य नहीं मेरे पग का. पूर्ण फलित प्रत्येक स्वप्न, नत संसार हो...
-
My questions: 1. Why did he resign in just 49 days? The usual answer is Lokpal which now looks as nothing but farce. I'll tell you wh...
-
कभी मुझसे था संसार चला कभी मुझसे था साम्राज्य फला मैं शिक्षक कहलाता था घर घर में पूजा जाता था सब छात्र शीष नवाते थे पलकों पर मुझे बिठा...