Tuesday, April 6, 2010

क्यूँ रोती तू मात बता

तू क्यूँ रोती हे मात बता,
तेरी व्यथा यहाँ कौन सुने,
तू करती रहे चीत्कार मगर,
कर्ण दान तुझे कौन करे.

क्रोध-काम में लिप्त हैं सब,
है लोभ इतना यह तृप्त हैं कब,
आडम्बर में आकंठ डूबे,
आनंद ही इनका ध्येय है अब

तेरी छाती चाहे छलनी हो,
व्यभिचार इनका चलता रहे,
तू करती रहे रुदन-क्रंदन,
सुख इनको बस मिलता रहे.

क्यूँ कष्ट उठाएं तेरे पुत्र,
क्यूँ तेरे लिए तज दें आनंद,
एक अंध दौड़ इनका है लक्ष्य,
क्यूँ तुझ हेतु पराभव-आलिंगन,

कोई क्रांति नहीं है हल इसका,
प्रत्येक बुद्धि ही भ्रष्ट हो जब,
क्या करे आदित्य दिवस देकर
मनुज अर्धरात्रि पूजे जब.

1 comment:

  1. This comment has been removed by a blog administrator.

    ReplyDelete

उत्पत्ति

समुद्र भी क्षुब्ध था, ये गगन भी सुप्त था,   थी धरा भी शांत सी, और वायु भी तो मौन था. न तृण कोई था हिल रहा, न पत्तियों में सरसरी , जीव सारे थ...