Saturday, December 13, 2014

मेरी लज्जा

हे नारी आज मैं लज्जित हूँ ,
यथोचित हुआ न तेरा सम्मान,
पशु ही रहा है नर ये सदा ,
तेरे मूल्य का इसको हुआ न भान।

तुझ से ही संसार बना,
तू ही शक्ति, तू ही द्रव्य - ज्ञान,
तू प्रेयसी तू ही जननी ,
तू निराकार का प्राण ध्यान।

तुझमें ममता तुझसे ही शौर्य ,
तू अन्नपूर्णा का साक्षात प्रमाण,
तुझ बिन धरा का मोल नहीं,
सब भस्म ही है, सब है निर्वाण।

हे अदिति है तुझसे ये विनती
न अब कर नर को क्षमा प्रदान,
हो जाने दे जग आदित्य विहीन
नर न रख पाये जो तेरा मान ।


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