Sunday, December 21, 2014

देव-विनती

कर दिया मुझको कलंकित
कर्म ऐसा मनुज तेरा
रह गया मैं भी अचंभित
हंता  तू और नाम मेरा

धर्म का क्या अर्थ ले
तू प्राण सब हर ले रहा
क्या नहीं ये ज्ञान तुझको
धरा पर हर धर्म मेरा


क्यों कठिन सौहार्द्र है
सहिष्णुता की क्यों कमी
हृदय में तेरे पड़ा क्यों
क्रोध तम घृणा का डेरा

नहीं पढ़ाया पाठ मैंने
उचित शिशुओं की बलि
न कभी मैंने कहा
तू हत्या कर तब पुत्र मेरा

सर्वदा इतना कहा बस
प्रेम कर मिल जाऊंगा
आदित्य हूँ , विश्वास कर
मैं भी तेरे गुण गाऊंगा ।  

3 comments:

  1. बहुत खुब
    - पुरानी बस्ती

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