Monday, December 20, 2021

उत्पत्ति

समुद्र भी क्षुब्ध था,
ये गगन भी सुप्त था,  
थी धरा भी शांत सी,
और वायु भी तो मौन था.
न तृण कोई था हिल रहा,
न पत्तियों में सरसरी ,
जीव सारे थे शिथिल,
औ' शब्द हर गौण था.

फिर हाहाकार उठ खड़ा
हुआ किधर से क्या पता,
बड़ी मची उथल पुथल,
भयंकर वो शोर था.

भय से था सहम उठा,
मनुज ह्रदय जो क्षीण था, 
अज्ञात का था भय बड़ा, 
औ' वो सामर्थ्यहीन था.

फिर हुयी जो ध्वनि, 
वो गगन को चीर के,
' हे मनुज ये देख ले, 
जो जन्मा, मेरा अंश था'

आदित्य का वो तेज देख,
मनुज यहाँ सिहर उठा. 

वात्सल्य

है तेरा ही वो वात्सल्य,

तेरा ही स्वार्थरहित वो स्नेह

तेरी ममता तेरा ही प्रेम,

जो अक्षत आज भी मेरी देह।  

 

जब भी रोया तेरे हाथों ने  

मेरे चक्षु से आंसू पोछे

जब प्रयत्न किया कभी चलने का,  

पथ के सारे कांटे नोचे।  

 

तेरी छवि मेरे नयनों में,

मेरे सर पे तेरा हाथ रहे

न कभी अकेला पड़ जाऊं,

जीवन भर तेरा साथ रहे।  

 

पर विडम्बना ही जीवन की,

तू एक दिन छोड़ के जाएगी

बस पूछूँ अगले जन्म में भी 

क्या मुझको पुत्र बनाएगी?

उत्पत्ति

समुद्र भी क्षुब्ध था, ये गगन भी सुप्त था,   थी धरा भी शांत सी, और वायु भी तो मौन था. न तृण कोई था हिल रहा, न पत्तियों में सरसरी , जीव सारे थ...