समुद्र भी क्षुब्ध था,
ये गगन भी सुप्त था,
ये गगन भी सुप्त था,
थी धरा भी शांत सी,
और वायु भी तो मौन था.
न तृण कोई था हिल रहा,
न पत्तियों में सरसरी ,
जीव सारे थे शिथिल,
औ' शब्द हर गौण था.
फिर हाहाकार उठ खड़ा
हुआ किधर से क्या पता,
बड़ी मची उथल पुथल,
भयंकर वो शोर था.भय से था सहम उठा,
मनुज ह्रदय जो क्षीण था,
अज्ञात का था भय बड़ा,
औ' वो सामर्थ्यहीन था.
फिर हुयी जो ध्वनि,
वो गगन को चीर के,
' हे मनुज ये देख ले,
जो जन्मा, मेरा अंश था'
आदित्य का वो तेज देख,
मनुज यहाँ सिहर उठा.