चाह मेरी हर हो पूरी,
भगवान नहीं मैं इस जग का.
हर मार्ग पर मैं रहूँ सफल,
भाग्य नहीं मेरे पग का.
पूर्ण फलित प्रत्येक स्वप्न,
नत संसार हो चरणों में,
मैं ब्रह्म नहीं, न नीलकंठ,
न श्रेष्ठतम सब वर्णों में.
देव नहीं,, न ही दनुज,
अलौकिक सामर्थ्य से विहीन.
एक पार्थिव सामान्य मनुज,
अपने स्वप्नों में पूर्ण लीन.
पर नयनों में रखूँगा स्वप्न,
देवपुत्र हूँ जो न देव सही,
सो देह में हर संभव प्रयत्न,
असफल वो आदित्य नहीं.
Wednesday, March 24, 2010
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उत्पत्ति
समुद्र भी क्षुब्ध था, ये गगन भी सुप्त था, थी धरा भी शांत सी, और वायु भी तो मौन था. न तृण कोई था हिल रहा, न पत्तियों में सरसरी , जीव सारे थ...
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My questions: 1. Why did he resign in just 49 days? The usual answer is Lokpal which now looks as nothing but farce. I'll tell you wh...
वाह! बहुत अच्छा है!
ReplyDeleteDhanyawaad!
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