Tuesday, February 25, 2020

प्रलय पूर्व

कर लो तुम उत्पात मगर,
पत्थर और तलवार मगर,
चाहे तान लो अपनी बंदूकें,
और वर्दी का भी फोड़ दो सर,

करो प्रदर्शन शक्ति का,
अहंकार में डूब रहो,
संख्या बल का तुम दर्प लिए,
चाहे आज भुजाएं फड़का लो,

पर रहे ध्यान इतना बंधु,
वो ऊपर बैठा देख रहा,
तुमने जो करतूतें की,
लेखा जोखा सब देख रहा,

जब उसका संयम टूटेगा,
प्रलय नेत्र वो खोलेगा,
तब सब मापे जाओगे,
त्राहि त्राहि चिल्लाओगे,

होगा तो रावण याद तुम्हें,
लोकों का राजा, दैत्य विशाल,
अहं कहां कम था उसका,
साहस असीम, था बल अपार

पर जब कुपित हुए कैलाशपति,
अंगुठे तले बस दबा दिया,
सहस्त्र वसंत भी बीत गए,
रावण तिल भर ना हिल पाया,

बस रोया था वो सहस्त्र साल,
इसलिए वो रावण कहलाया, 
गति उसकी जब ऐसी हुई,
तुमने अपना क्या सोच लिया?

मत करो प्रदर्शन शक्ति का,
मत करो प्रलय का आह्वान,
विनय, प्रेम, सौहार्द्र सहित,
जी लो, कर लो इह लोक सुभान।

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