Wednesday, December 24, 2014

धैर्य



चल छोड़ दें ये जिद एक आशियाँ बनाने की,
वक्त के थपेड़ों का मिज़ाज कुछ और है।
बेहतर होगा कि साथ कर लें आंधियां ,
उड़ के जहां जा पहुँचें, वो अपनी ठौर है।


या कह दें हवाओं से अब बहुत है हो गया,
जिन्दगी वहीं है जहाँ हैं हम खड़े,
हिलेंगे न तूफान से न जलजले से हम,
बाजुओं में अपने इतना तो जोर है।

Tuesday, December 23, 2014

अंधभक्ति

चीजें नचाती भारत को वर्तमान में तीन,
धर्म और क्रिकेट हैं दो, तीजे राजनीति की बीन।

राजनीति की बीन नेता जब भी बजाए,
जनता सबकुछ भूल बस फिर ठुमके लगाए।

फिर ठुमके लगाए जब जब गेंद पे बल्ला घूमे,
हर छक्के पे बल्लेबाज के चित्र को चूमे।

चित्र को चूमे और जोर से नारे लगाएँ,
धर्म के नाम पे अपनों को ही मारे जाएँ।

अंधभक्ति ये पुत्र मेरे 
कब तक करते रहोगे,
मैं भारत माँ अब त्रस्त हुई
कब तक खुद ही मरते रहोगे।

Monday, December 22, 2014

शिक्षक

कभी मुझसे था संसार चला
कभी मुझसे था साम्राज्य फला
मैं शिक्षक कहलाता था
घर घर में पूजा जाता था
सब छात्र शीष नवाते थे
पलकों पर मुझे बिठाते थे
राष्ट्र ने फिर बदला चोला
राजनीति शिक्षा में घोला
शिक्षक से हो गया मास्टर
छात्रों से लगने लगा डर
बना सरकार का याचक विशेष
अब शिक्षक का भग्नावशेष।

Sunday, December 21, 2014

देव-विनती

कर दिया मुझको कलंकित
कर्म ऐसा मनुज तेरा
रह गया मैं भी अचंभित
हंता  तू और नाम मेरा

धर्म का क्या अर्थ ले
तू प्राण सब हर ले रहा
क्या नहीं ये ज्ञान तुझको
धरा पर हर धर्म मेरा


क्यों कठिन सौहार्द्र है
सहिष्णुता की क्यों कमी
हृदय में तेरे पड़ा क्यों
क्रोध तम घृणा का डेरा

नहीं पढ़ाया पाठ मैंने
उचित शिशुओं की बलि
न कभी मैंने कहा
तू हत्या कर तब पुत्र मेरा

सर्वदा इतना कहा बस
प्रेम कर मिल जाऊंगा
आदित्य हूँ , विश्वास कर
मैं भी तेरे गुण गाऊंगा ।  

Saturday, December 13, 2014

मेरी लज्जा

हे नारी आज मैं लज्जित हूँ ,
यथोचित हुआ न तेरा सम्मान,
पशु ही रहा है नर ये सदा ,
तेरे मूल्य का इसको हुआ न भान।

तुझ से ही संसार बना,
तू ही शक्ति, तू ही द्रव्य - ज्ञान,
तू प्रेयसी तू ही जननी ,
तू निराकार का प्राण ध्यान।

तुझमें ममता तुझसे ही शौर्य ,
तू अन्नपूर्णा का साक्षात प्रमाण,
तुझ बिन धरा का मोल नहीं,
सब भस्म ही है, सब है निर्वाण।

हे अदिति है तुझसे ये विनती
न अब कर नर को क्षमा प्रदान,
हो जाने दे जग आदित्य विहीन
नर न रख पाये जो तेरा मान ।


Tuesday, April 6, 2010

क्यूँ रोती तू मात बता

तू क्यूँ रोती हे मात बता,
तेरी व्यथा यहाँ कौन सुने,
तू करती रहे चीत्कार मगर,
कर्ण दान तुझे कौन करे.

क्रोध-काम में लिप्त हैं सब,
है लोभ इतना यह तृप्त हैं कब,
आडम्बर में आकंठ डूबे,
आनंद ही इनका ध्येय है अब

तेरी छाती चाहे छलनी हो,
व्यभिचार इनका चलता रहे,
तू करती रहे रुदन-क्रंदन,
सुख इनको बस मिलता रहे.

क्यूँ कष्ट उठाएं तेरे पुत्र,
क्यूँ तेरे लिए तज दें आनंद,
एक अंध दौड़ इनका है लक्ष्य,
क्यूँ तुझ हेतु पराभव-आलिंगन,

कोई क्रांति नहीं है हल इसका,
प्रत्येक बुद्धि ही भ्रष्ट हो जब,
क्या करे आदित्य दिवस देकर
मनुज अर्धरात्रि पूजे जब.

Wednesday, March 24, 2010

Spirit of Me

चाह मेरी हर हो पूरी,
भगवान नहीं मैं इस जग का.
हर मार्ग पर मैं रहूँ सफल,
भाग्य नहीं मेरे पग का.

पूर्ण फलित प्रत्येक स्वप्न,
नत संसार हो चरणों में,
मैं ब्रह्म नहीं, न नीलकंठ,
न श्रेष्ठतम सब वर्णों में.

देव नहीं,, न ही दनुज,
अलौकिक सामर्थ्य से विहीन.
एक पार्थिव सामान्य मनुज,
अपने स्वप्नों में पूर्ण लीन.

पर नयनों में रखूँगा स्वप्न,
देवपुत्र हूँ जो न देव सही,
सो देह में हर संभव प्रयत्न,
असफल वो आदित्य नहीं.

उत्पत्ति

समुद्र भी क्षुब्ध था, ये गगन भी सुप्त था,   थी धरा भी शांत सी, और वायु भी तो मौन था. न तृण कोई था हिल रहा, न पत्तियों में सरसरी , जीव सारे थ...